Tuesday, November 5, 2024

भिक्षुवर्षियसि

पथ के तट पर, पेड़ के तल में,

बुझी हुई भट्टी की तरह बूढ़ी

एक बैठी है!

पीड़ित, मक्खियों की भिनभिनाहट

अब सहन न हो पा रहा उससे!


बालों में चांदी उतर आई है उसकी,

शरीर पर सिलवटें,

कांतिविहीन कांच की आंखें,

उससे तो शाप ही बेहतर लग्ता!


गिर गई वो बीमार पड़के,

भीख भी न मांग सकती, बलहीन जो;

आ रहा है शीतकाल,

घर न उसका, निःसंग जो!



वृद्ध बनके, घुटने कंटके

जीवन पर विश्वास हिलके,

पास में पत्थर की तरह

निर्जीव बनके, 

टुकड़ों में बंट के, गिर पड़ी वो !


"वो बूढ़ी मरगयि तो

वो पाप किसका"

हवा का झोंका

पूछ  रहा मुझसे


हड्डी को चबाते हुए

कुत्ते ने भी कुछ न कहा ,

मक्खी को मारकर

छिपकली भी चल पड़ी !


घने अंधेरे में,

धूल की मेले में,

“ये मेरा पाप नहीं” कहकर

जूठी थाली उड़के आई !


-written by Sri-Sri(Mahaprasthanam - bikshuvarshiyasi)

Translated by telugufile

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