पथ के तट पर, पेड़ के तल में,
बुझी हुई भट्टी की तरह बूढ़ी
एक बैठी है!
पीड़ित, मक्खियों की भिनभिनाहट
अब सहन न हो पा रहा उससे!
बालों में चांदी उतर आई है उसकी,
शरीर पर सिलवटें,
कांतिविहीन कांच की आंखें,
उससे तो शाप ही बेहतर लग्ता!
गिर गई वो बीमार पड़के,
भीख भी न मांग सकती, बलहीन जो;
आ रहा है शीतकाल,
घर न उसका, निःसंग जो!
वृद्ध बनके, घुटने कंटके
जीवन पर विश्वास हिलके,
पास में पत्थर की तरह
निर्जीव बनके,
टुकड़ों में बंट के, गिर पड़ी वो !
"वो बूढ़ी मरगयि तो
वो पाप किसका"
हवा का झोंका
पूछ रहा मुझसे
हड्डी को चबाते हुए
कुत्ते ने भी कुछ न कहा ,
मक्खी को मारकर
छिपकली भी चल पड़ी !
घने अंधेरे में,
धूल की मेले में,
“ये मेरा पाप नहीं” कहकर
जूठी थाली उड़के आई !
-written by Sri-Sri(Mahaprasthanam - bikshuvarshiyasi)
Translated by telugufile
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